डीपफेक और AI-जनित फर्जी कंटेंट को लेकर केंद्र सरकार ने अपनी नियामक व्यवस्था को और सख्त कर दिया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) ने साफ किया है कि अब सरकार या अदालत के वैध आदेश के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को गैरकानूनी AI कंटेंट सिर्फ 3 घंटे के भीतर हटाना होगा, जबकि पहले इसके लिए 36 घंटे का समय मिलता था।
क्यों घटाई गई समय सीमा
सरकार का तर्क है कि डीपफेक और भड़काऊ AI कंटेंट के मामलों में देरी से हटाने पर तब तक नुकसान फैल चुका होता है, जब तक कंपनियां कार्रवाई करती हैं। यही वजह है कि 10 फरवरी 2026 से लागू हुए संशोधित IT नियमों में यह समयसीमा बड़े मार्जिन से घटाकर 3 घंटे कर दी गई है, ताकि नुकसान होने से पहले ही ऐसे कंटेंट पर लगाम लगाई जा सके।
AI कंटेंट पर अनिवार्य लेबलिंग
नए नियमों का एक और अहम पहलू यह है कि अब इंटरनेट पर मौजूद हर वह कंटेंट—चाहे वह फोटो हो, वीडियो हो या ऑडियो—जो किसी AI टूल की मदद से बनाया गया है, उस पर साफ तौर पर लेबल और पहचान योग्य मेटाडेटा देना अनिवार्य होगा। इससे यूजर्स आसानी से यह पहचान सकेंगे कि कोई सामग्री असली है या कृत्रिम रूप से तैयार की गई है।
प्लेटफॉर्म्स के लिए सख्त जिम्मेदारी
सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य डिजिटल मध्यस्थों को अब ऐसे तकनीकी सिस्टम भी लगाने होंगे जो कानून का उल्लंघन करने वाली AI-जनित सामग्री को खुद पहचान सकें और उसे फैलने से पहले ही रोक सकें। अगर कोई प्लेटफॉर्म इन नियमों का पालन नहीं करता, तो उसे आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाला “सेफ हार्बर” कानूनी संरक्षण गंवाना पड़ सकता है, जो प्लेटफॉर्म्स के लिए एक बड़ा जोखिम है।
न्यूडिटी और फर्जी पहचान के मामलों पर विशेष सख्ती
खास तौर पर न्यूडिटी, फर्जी पहचान या डीपफेक से जुड़ी शिकायतों के निपटारे को भी पहले से कहीं ज्यादा तेज किया गया है। सरकार ने यह भी अनिवार्य किया है कि सोशल मीडिया कंपनियां हर तीन महीने में यूजर्स को नए नियमों की जानकारी दें, ताकि आम लोग भी इन बदलावों से वाकिफ रहें।
तकनीकी समाधानों पर भी काम
सरकार ने बताया कि इंडियाAI मिशन के तहत डीपफेक पहचान से जुड़ी 13 जिम्मेदार AI परियोजनाओं को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें आईआईटी जोधपुर और आईआईटी मद्रास द्वारा विकसित ‘साक्ष्य’ फ्रेमवर्क और आईआईटी खड़गपुर का रियल-टाइम वॉयस डीपफेक डिटेक्शन सिस्टम जैसी अहम परियोजनाएं शामिल हैं, जो तकनीकी स्तर पर भी डीपफेक की पहचान करने में मदद करेंगी।
अमल में अभी भी चुनौतियां
हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि अभी भी ज्यादातर AI वीडियोज पर सिंथेटिक कंटेंट का लेबल नजर नहीं आता, और न ही किसी प्लेटफॉर्म ने अब तक तीन घंटे की समयसीमा में कंटेंट हटाने की प्रक्रिया को पूरी तरह लागू किया है। यही वजह है कि विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या बड़ी टेक कंपनियां इन सख्त नियमों का वास्तव में कितनी तेजी से पालन करेंगी, और सरकार इसे कैसे सुनिश्चित कराएगी।




