बिहार ने हजारों साल की बीमारी से पाई मुक्ति – गंडा रोग पर जीत का एलान

बिहार गंडा रोग मुक्ति, स्वास्थ्य विभाग जीत

स्वास्थ्य में ऐतिहासिक विजय: बिहार ने गंडा रोग को मार गिराया

पटना – जुलाई 2026 में बिहार ने एक ऐतिहासिक विजय हासिल की। राज्य ने गंभीर संक्रामक रोग ‘लिम्फेटिक फाइलेरिएसिस’ (जिसे आमतौर पर ‘गंडा’ कहते हैं) के खिलाफ जीत का एलान किया। अरारिया, मधेपुरा और सुपौल जिलों में पहली ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (TAS) सफल रहा। यह बीमारी भारत में लंबे समय से लाखों लोगों को प्रभावित करती रही है।

यह बीमारी क्या होती है?

लिम्फेटिक फाइलेरिएसिस एक परजीवी रोग है जो मच्छरों के काटने से फैलता है। इसे आमतौर पर ‘हाथी पैर की बीमारी’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें:

  • पैर फूल जाते हैं: कभी-कभी हाथी जैसे मोटे हो जाते हैं
  • गंभीर दर्द: रोगी को चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है
  • शरीर में सूजन: अंगों में असहनीय दर्द
  • सामाजिक शर्मिंदगी: लोग रोगियों से दूर रहने लगते हैं
  • काम खोने का खतरा: मजदूर काम नहीं कर पाते

भारत में कितना खतरनाक था यह रोग?

भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 14 मिलियन (1.4 करोड़) लोग इस रोग से प्रभावित थे। भारत दुनिया के उन देशों में से था जहां यह रोग सबसे ज्यादा फैला था। बिहार विशेषकर गंडक नदी के डेल्टा इलाके में यह बीमारी बहुत आम थी क्योंकि:

  • गर्म-नम जलवायु: मच्छरों के लिए आदर्श
  • बहुत सारा पानी: तालाब, नहर, बाढ़
  • स्वच्छता की कमी: पानी का सही व्यवस्थापन नहीं
  • गरीबी: लोग मच्छरदानी का उपयोग नहीं कर सकते थे

बिहार ने कैसे जीत हासिल की?

यह जीत एक दीर्घकालीन संघर्ष का नतीजा है जो वर्षों से चल रहा था:

  • जन जागरूकता कार्यक्रम: हजारों गांवों में शिविर लगाए गए
  • मुफ्त दवाई वितरण: सरकार ने हजारों लोगों को दवाई दी
  • मच्छर नियंत्रण: DDT का छिड़काव किया गया
  • पानी की सफाई: सार्वजनिक जलस्रोतों को साफ किया
  • शिक्षा कार्यक्रम: स्कूलों में बीमारी के बारे में पढ़ाया गया
  • महिला कार्यकर्ता: गांवों में महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया

ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (TAS) क्या है?

यह एक वैज्ञानिक परीक्षण है जो यह जांचता है कि क्या बीमारी की संचरण की क्षमता समाप्त हो गई है। इसमें:

  • 8-10 साल के बच्चों का परीक्षण: उनके खून का नमूना लिया जाता है
  • 10,000 बच्चों की जांच: यह सुनिश्चित करने के लिए
  • 1% से कम सकारात्मक: मतलब बीमारी लगभग खत्म है
  • WHO की मान्यता: अगर TAS पास हो तो WHO मान्यता देता है

अरारिया, मधेपुरा, सुपौल – मुक्ति पाने वाली पहली जिलें

बिहार के इन तीनों जिलों ने पहले TAS को पास किया है। यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये जिले वहां थे जहां बीमारी सबसे ज्यादा फैली थी। अब यहां के लाखों लोग इस भयानक बीमारी से मुक्त हो गए हैं।

इस जीत का असर:

  • बच्चों का भविष्य: अब नई पीढ़ी को यह बीमारी नहीं होगी
  • महिलाओं की मुक्ति: विधवा महिलाओं को अब ठीक होने की उम्मीद
  • आर्थिक लाभ: लोग अब काम कर सकेंगे और आय कर सकेंगे
  • स्वास्थ्य पर खर्च कम: सरकार का और पैसा बचेगा
  • आत्मविश्वास में वृद्धि: लोग सामाजिक जीवन में वापस आ सकेंगे

भारत की वैश्विक जिम्मेदारी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2020 की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में लिम्फेटिक फाइलेरिएसिस के सबसे ज्यादा मामले थे। भारत सरकार का लक्ष्य था 2021 तक इसे खत्म करना। बिहार की यह सफलता भारत को WHO के लक्ष्य की ओर ले जा रही है।

अगला कदम – पूरे बिहार का मुक्तिकरण

अब बिहार सरकार बाकी जिलों में भी इसी तरह का अभियान चलाने वाली है। योजना है कि 2027 तक पूरा बिहार इस बीमारी से मुक्त हो जाए। निष्कर्ष: बिहार की इस सफलता से दुनिया को दिखा कि कैसे विकासशील देश भी स्वास्थ्य संकट को हल कर सकते हैं।

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