सरकार की GOBArdhan योजना के तहत बायो-CNG को बढ़ावा देने पर जोर बढ़ रहा है, जिससे आम लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या उनकी कार को भी बायो-CNG पर चलाया जा सकता है, और इससे माइलेज, इंजन और मेंटनेंस पर क्या असर पड़ेगा।
क्या है GOBArdhan योजना
GOBArdhan (गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन) केंद्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका मकसद गोबर, कृषि अवशेष और अन्य जैविक कचरे से बायोगैस और बायो-CNG का उत्पादन बढ़ाना है। इस योजना के तहत देशभर में बायोगैस प्लांट लगाने को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे न सिर्फ स्वच्छ ईंधन मिलेगा बल्कि किसानों को अतिरिक्त आय का जरिया भी मिलेगा।
बायो-CNG और सामान्य CNG में क्या फर्क
तकनीकी रूप से बायो-CNG और पेट्रोलियम आधारित CNG की संरचना लगभग एक जैसी होती है, दोनों में मुख्य रूप से मीथेन गैस होती है। इसका मतलब है कि जो वाहन पहले से CNG पर चलने के लिए बने हैं, वे बिना किसी बड़े बदलाव के बायो-CNG पर भी चल सकते हैं।
क्या कार में बदलाव कराना होगा
जिन वाहनों में पहले से फैक्ट्री-फिटेड या रेट्रोफिटेड CNG किट लगी है, उन्हें बायो-CNG इस्तेमाल करने के लिए किसी अतिरिक्त बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि जिन वाहनों में अभी CNG किट नहीं लगी है, उन्हें बायो-CNG इस्तेमाल करने के लिए पहले सामान्य CNG किट ही लगवानी होगी, जो किसी भी अधिकृत सर्विस सेंटर पर उपलब्ध है।
माइलेज और परफॉर्मेंस पर असर
ऑटो विशेषज्ञों के मुताबिक बायो-CNG की गुणवत्ता और शुद्धता अगर तय मानकों के अनुरूप हो, तो इसका माइलेज और परफॉर्मेंस पर असर सामान्य CNG के बराबर ही रहता है। हालांकि अगर गैस की शुद्धता में कमी हो, तो इंजन की परफॉर्मेंस और माइलेज दोनों प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए भरोसेमंद स्रोत से ही बायो-CNG भरवाना जरूरी है।
मेंटनेंस को लेकर सावधानियां
विशेषज्ञों की सलाह है कि बायो-CNG इस्तेमाल करने वाले वाहन मालिकों को नियमित रूप से इंजन ऑयल और CNG किट की जांच करानी चाहिए, क्योंकि किसी भी तरह की अशुद्ध गैस लंबे समय में इंजन के पुर्जों पर असर डाल सकती है। समय पर सर्विसिंग कराने से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पर्यावरण और आर्थिक फायदे
बायो-CNG को अपनाने से सिर्फ व्यक्तिगत वाहन मालिकों को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को फायदा होगा। इससे जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता कम होगी, कृषि अवशेष जलाने जैसी प्रदूषणकारी गतिविधियां घटेंगी, और किसानों को गोबर व फसल अवशेष बेचकर अतिरिक्त आय का जरिया भी मिलेगा। लंबे समय में यह योजना ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने में भी मददगार साबित हो सकती है।

