भारत के लगभग हर घर की रसोई में बनने वाली अरहर (तूर) दाल अब एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि की वजह बन गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने अप्रैल 2026 में अरहर की लोकप्रिय ‘आशा’ किस्म का पहला पूर्ण, पूरी तरह एनोटेटेड जीनोम तैयार कर लिया है। आसान भाषा में कहें तो वैज्ञानिकों ने अरहर के पूरे जेनेटिक नक्शे को अब पूरी तरह पढ़ लिया है।
क्या है T2T जीनोम
इस उपलब्धि को टेलोमेयर-टू-टेलोमेयर (T2T) जीनोम कहा जाता है, जिसका मतलब है कि क्रोमोसोम के एक सिरे से दूसरे सिरे तक की पूरी जेनेटिक जानकारी बिना किसी अंतराल के डिकोड कर ली गई है। यह पुराने ड्राफ्ट जीनोम से कहीं ज्यादा सटीक और संपूर्ण होता है, जिससे वैज्ञानिकों को पौधे के हर जीन की सटीक स्थिति और कार्यक्षमता के बारे में जानकारी मिलती है।
15 साल की यात्रा का नतीजा
दिलचस्प बात यह है कि अरहर के जीनोम पर काम कोई नई शुरुआत नहीं है। साल 2011 में ही नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (NIPB) ने अरहर की ‘आशा’ किस्म का दुनिया का पहला ड्राफ्ट जीनोम तैयार किया था। अब 15 साल बाद उसी किस्म का पूरी तरह परिष्कृत और एनोटेटेड T2T जीनोम तैयार होना भारतीय दलहन अनुसंधान के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है।
क्यों जरूरी है अरहर की फसल
अरहर भारत की सबसे महत्वपूर्ण दलहनी फसलों में गिनी जाती है और करोड़ों भारतीयों के लिए प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है। देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा में इसकी भूमिका बेहद अहम है, खासकर उन परिवारों के लिए जिनके लिए मांसाहारी प्रोटीन स्रोत आसानी से उपलब्ध नहीं है या महंगे हैं।
किसानों को कैसे मिलेगा फायदा
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पूर्ण जीनोम की मदद से आने वाले समय में ज्यादा पैदावार देने वाली, कीट-बीमारियों से बेहतर तरीके से लड़ने वाली और बदलते मौसम व जलवायु परिवर्तन को झेलने में सक्षम नई किस्में विकसित करना कहीं आसान हो जाएगा। पारंपरिक तरीकों से नई किस्म विकसित करने में सालों लग जाते थे, लेकिन अब जीनोम का पूरा नक्शा होने से वैज्ञानिक सीधे उन जीन्स को निशाना बना सकेंगे जो पैदावार, रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूखा सहनशीलता से जुड़े हैं।
राष्ट्रीय संसाधन के तौर पर अहम
ICAR के मुताबिक यह पूरी तरह एनोटेटेड T2T जीनोम अब देशभर के वैज्ञानिकों के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संसाधन के तौर पर काम करेगा। इसका मतलब है कि अलग-अलग कृषि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के वैज्ञानिक इस डेटा का इस्तेमाल कर अपने-अपने क्षेत्रों की जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल नई किस्में विकसित कर सकेंगे, जिससे पूरे देश में अरहर की खेती को फायदा मिलेगा।
दलहन उत्पादन बढ़ाने की बड़ी कड़ी
भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है, लेकिन घरेलू मांग को पूरा करने के लिए अब भी हर साल दालों का आयात करना पड़ता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अरहर के इस जीनोम मैप जैसी वैज्ञानिक प्रगति से आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है, जिससे किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों मजबूत होंगी।




