अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति एक बार फिर कानूनी घेरे में आ गई है। अमेरिका के 25 राज्यों ने मिलकर ट्रंप प्रशासन द्वारा हाल ही में लगाए गए नए टैरिफ को गैरकानूनी बताते हुए संघीय अदालत में मुकदमा दायर कर दिया है। यह मामला अब आगे बढ़कर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की संभावना है, जिससे यह विवाद अमेरिकी व्यापार नीति के इतिहास के सबसे बड़े कानूनी टकरावों में से एक बन सकता है।
राज्यों का क्या है आरोप
याचिका दायर करने वाले राज्यों का कहना है कि राष्ट्रपति ने बिना कांग्रेस की मंजूरी के अपने कार्यकारी अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए व्यापक स्तर पर टैरिफ थोप दिए, जो अमेरिकी संविधान के तहत तय शक्तियों के बंटवारे का उल्लंघन है। अमेरिका में व्यापार और टैक्स से जुड़े बड़े फैसले परंपरागत रूप से कांग्रेस के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, और राज्यों की दलील है कि राष्ट्रपति ने आपातकालीन शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए यह सीमा लांघी है।
ट्रंप प्रशासन का पक्ष
दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह टैरिफ राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम हैं। प्रशासन का तर्क है कि व्यापार घाटे को कम करने और घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए ऐसे सख्त फैसले लेने ही होंगे। व्हाइट हाउस की ओर से कहा गया है कि वे इस कानूनी लड़ाई का पूरी मजबूती से सामना करेंगे।
अमेरिकी व्यापार नीति पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब ट्रंप के टैरिफ फैसलों को अदालत में चुनौती दी गई हो। अपने मौजूदा कार्यकाल में ट्रंप ने चीन, यूरोपीय संघ और कई अन्य देशों पर भारी टैरिफ लगाए हैं, जिनका मकसद अमेरिकी विनिर्माण को बढ़ावा देना बताया गया है। आलोचकों का कहना है कि इन टैरिफ का बोझ अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों पर ही पड़ता है, क्योंकि आयातित सामान महंगा होने से कीमतें बढ़ती हैं।
भारत समेत अन्य देशों पर भी असर
ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। हाल के महीनों में रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर भी भारी टैरिफ का खतरा मंडराता रहा है, जिसे लेकर अमेरिकी सीनेट में अलग से एक बिल पर चर्चा चल रही है। ऐसे में अगर अमेरिकी अदालतें राष्ट्रपति के टैरिफ अधिकारों पर सीमाएं तय करती हैं, तो इसका असर सीधे तौर पर भारत जैसे व्यापारिक साझेदार देशों की रणनीति पर भी पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने पर क्या होगा
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है, तो अदालत को यह तय करना होगा कि आपातकालीन आर्थिक शक्तियों के तहत राष्ट्रपति किस हद तक अकेले व्यापार नीति में बदलाव कर सकते हैं। इस फैसले का असर सिर्फ मौजूदा टैरिफ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह आने वाले वर्षों में अमेरिकी राष्ट्रपतियों की व्यापार नीति से जुड़ी शक्तियों को भी परिभाषित करेगा।
वैश्विक बाजारों पर नजर
इस कानूनी लड़ाई के नतीजे पर दुनियाभर के निवेशकों और व्यापारिक भागीदारों की नजर टिकी है। अगर अदालत टैरिफ के खिलाफ फैसला सुनाती है, तो इससे अमेरिकी व्यापार नीति में अनिश्चितता कम हो सकती है, जिसका सकारात्मक असर वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है। वहीं अगर अदालत ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला देती है, तो राष्ट्रपति के हाथ व्यापार नीति को लेकर और मजबूत हो जाएंगे।



