देश में इस साल का मॉनसून एक अजीब उलटफेर दिखा रहा है। जहां कुछ राज्य बाढ़ जैसे हालात से जूझ रहे हैं, वहीं मौसम विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 1 जून से 2 अगस्त तक देशभर में औसतन 12 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि इस बार मॉनसून का वितरण बेहद असमान रहा है।
शुरुआत से ही धीमी रही रफ्तार
जून के महीने में ही मॉनसून की चाल कमजोर पड़ गई थी। पूरे महीने देशभर में सिर्फ 106.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य तौर पर जून में 165.3 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी। यानी शुरुआत में ही करीब 35 प्रतिशत की भारी कमी देखी गई, जिसने आगे की पूरी मॉनसून अवधि के आंकड़ों पर असर डाला।
किस इलाके में कितनी बारिश
मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक मध्य भारत अकेला ऐसा क्षेत्र है जहां सामान्य से ज्यादा बारिश हुई—यहां 542.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जो सामान्य से 5.7 प्रतिशत अधिक है। इसके उलट उत्तर-पश्चिम भारत में अब तक 13.3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। सबसे ज्यादा असर पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में दिखा, जहां बारिश की कमी सबसे गंभीर स्तर पर पहुंच गई है।
अल नीनो और जलवायु परिवर्तन की भूमिका
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने साल की शुरुआत में ही आशंका जताई थी कि 2026 का मॉनसून सामान्य से कमजोर रह सकता है, जिसकी करीब 60 प्रतिशत संभावना जताई गई थी। जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो के प्रभाव के साथ-साथ वैश्विक तापवृद्धि भी इस असमान बारिश के पैटर्न को और गंभीर बना रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक महासागरों ने पहले ही मानव गतिविधियों से पैदा हुई करीब 90 प्रतिशत अतिरिक्त गर्मी सोख ली है, जिससे मौसम चक्र अनियमित होता जा रहा है।
इतिहास में कब-कब आए ऐसे सूखे
भारत में 1871 से 2015 के बीच 26 बार ऐसे साल आए जब बारिश में 10 प्रतिशत से ज्यादा की कमी दर्ज हुई। इनमें सबसे भीषण सूखा 1972 में पड़ा था, जब बारिश सामान्य से 23.9 प्रतिशत कम रही। इसके बाद 2009 में भी 22 प्रतिशत की बड़ी कमी देखी गई थी। मौजूदा 12 प्रतिशत की कमी अभी उतनी गंभीर नहीं है, लेकिन असमान वितरण इसे और चिंताजनक बना देता है।
खेती और जल आपूर्ति पर मंडराता खतरा
मॉनसून भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, खासकर खरीफ फसलों के लिए। धान, मक्का और दालों जैसी फसलों की बुवाई सीधे तौर पर समय पर और पर्याप्त बारिश पर निर्भर करती है। जिन क्षेत्रों में बारिश की कमी है, वहां जलाशयों का स्तर घटने से आने वाले महीनों में सिंचाई और पीने के पानी दोनों को लेकर दिक्कत बढ़ सकती है। वहीं जिन इलाकों में ज्यादा बारिश हुई है, वहां फसलों में जलभराव और बाढ़ से नुकसान का खतरा बना हुआ है।
आगे क्या करना चाहिए
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को अपने इलाके के स्थानीय मौसम पूर्वानुमान पर करीबी नजर रखनी चाहिए और फसल चयन में लचीलापन अपनाना चाहिए। वहीं राज्य सरकारों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे जल संग्रहण और सिंचाई प्रबंधन की योजनाओं को क्षेत्रीय जरूरतों के हिसाब से तुरंत दुरुस्त करें, ताकि असमान मॉनसून के दोहरे खतरे—बाढ़ और सूखा—दोनों से निपटा जा सके।


