नई दिल्ली: संसद के मौजूदा सत्र में शत्रुसंपत्ति (संशोधन) विधेयक को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। सरकार की ओर से पेश किए जा रहे इस विधेयक का मकसद देश में मौजूद शत्रु संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान की प्रक्रिया को स्पष्ट और तेज बनाना बताया जा रहा है, लेकिन विपक्षी दलों ने इसके कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई है।
क्या हैं शत्रु संपत्तियां
शत्रु संपत्ति वे संपत्तियां हैं जो 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 तथा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के दौरान भारत छोड़कर पाकिस्तान या चीन चले गए लोगों की यहां छूट गई थीं। शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968 के तहत इन संपत्तियों की देखरेख भारत सरकार के कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी कार्यालय के अधीन आती है। देशभर में हजारों करोड़ रुपये मूल्य की ऐसी संपत्तियां चिन्हित की जा चुकी हैं, जिनमें जमीन, इमारतें और व्यावसायिक परिसर शामिल हैं।
विधेयक में प्रस्तावित बदलाव
सरकार का कहना है कि मौजूदा कानूनी प्रक्रिया में कई खामियां हैं जिनके चलते संपत्तियों के निपटान में वर्षों लग जाते हैं और कई मामले अदालतों में लंबित पड़े रहते हैं। नए विधेयक में कस्टोडियन को अधिक अधिकार देने, त्वरित निपटान तंत्र बनाने और संपत्तियों की नीलामी प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव है।
विपक्ष की आपत्तियां
कांग्रेस, DMK और तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने मांग की है कि विधेयक को विस्तृत चर्चा के लिए संसदीय स्थायी समिति के पास भेजा जाए। विपक्ष का तर्क है कि कस्टोडियन को दिए जा रहे व्यापक अधिकार न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश को सीमित कर सकते हैं, जिससे प्रभावित पक्षकारों को उचित सुनवाई का मौका नहीं मिल पाएगा। कुछ सांसदों ने यह भी कहा कि जिन परिवारों की पुरानी विरासत संपत्तियां इस दायरे में आती हैं, उनके अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए।
आगे क्या
सरकार की ओर से कहा गया है कि विधेयक पर सभी दलों के सुझावों पर विचार किया जाएगा। संसद के इस सत्र में विधेयक पर आगे विस्तृत चर्चा होने की संभावना है, जिस पर पूरे देश की निगाह टिकी है।



